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विश्व॑स्य के॒तुर्भुव॑नस्य॒ गर्भ॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ज्जाय॑मानः । वी॒ळुं चि॒दद्रि॑मभिनत्परा॒यञ्जना॒ यद॒ग्निमय॑जन्त॒ पञ्च॑ ॥

English Transliteration

viśvasya ketur bhuvanasya garbha ā rodasī apṛṇāj jāyamānaḥ | vīḻuṁ cid adrim abhinat parāyañ janā yad agnim ayajanta pañca ||

Pad Path

विश्व॑स्य । के॒तुः । भुव॑नस्य । गर्भः॑ । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णा॒त् । जाय॑मानः । वी॒ळुम् । चि॒त् । अद्रि॑म् । अ॒भि॒न॒त् । प॒रा॒ऽयन् । जनाः॑ । यत् । अ॒ग्निम् । अय॑जन्त । पञ्च॑ ॥ १०.४५.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:45» Mantra:6 | Ashtak:7» Adhyay:8» Varga:28» Mantra:6 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वस्य केतुः) संसार का प्रकाशक, प्रेरक, संचालक (भुवनस्य गर्भः) प्राणिमात्र का ग्रहण करनेवाला-स्वीकार करनेवाला (जायमानः-रोदसी-अपृणात्) उदय होता हुआ द्युलोक और पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से भर देता है-छिन्न-भिन्न कर देता है (परायन् वीळुं चित्-अद्रिम्-अभिनत्) बलवान् मेघ को भी पराक्रम से तोड़ देता है-छिन्न-भिन्न कर देता है (यत्-पञ्च जनाः-अग्निम्-अयजन्त) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद नामक पाँचों जन जब अग्निहोत्र में अग्नि का यजन करते हैं, उस समय ॥६॥
Connotation: - सूर्य संसार में प्रगति देनेवाला है, आकाश और पृथ्वी के मध्य में अपने प्रकाश को भर देता है। मनुष्यमात्र जब सामूहिकरूप से यजन करते हैं और यज्ञ में मेघ बनते हैं, उन मेघों को पृथ्वी पर बरसा देनेवाला सूर्य है। वह मेघों को छिन्न-भिन्न कर पृथ्वी पर बरसा देता है, जो प्राणियों के पोषण का निमित्त बनता है ॥६॥
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वस्य केतुः) संसारस्य प्रद्योतयिता प्रेरयिता चालयिता (भुवनस्य गर्भः) भूतजातस्य प्राणिमात्रस्य ग्रहणकर्त्ता स्वीकर्त्ता (जायमानः-रोदसी-अपृणात्) उदयन् द्यावापृथिव्यौ स्वप्रकाशेन पूरयति (परायन् वीळुं चित्-अद्रिम्-अभिनत्) बलवन्तमपि मेघम् “अद्रिर्मेघनाम” [निघ० १।१०] पराक्रमं कुर्वन् भिनत्ति (यत् पञ्च जनाः-अग्निम्-अयजन्त) ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रनिषादाः यदाऽग्निहोत्रेऽग्निं यजन्ति-अग्निहोत्रं कुर्वन्ति तदा “पञ्चजना………चत्वारो वर्णा निषादः पञ्चमः [निरु० ३।८] ॥६॥